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न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार में मतभेद एक बार फिर सतह पर

न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट और सरकार में मतभेद की खबरें एक बार फिर सतह पर हैैं। इस पर हैरानी नहीं। ऐसे मतभेद पहले भी सामने आएं हैैं और यह तय है कि आगे भी तब तक आते रहेंगे जब तक वह कोलेजियम व्यवस्था बनी रहती है जिसमें न्यायाधीश ही न्यायाधीशों को नियुक्त करते हैैं। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम ने झारखंड और गुवाहाटी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को शीर्ष अदालत में प्रोन्नत करने की जो सिफारिश की थी उस पर सरकार ने नए सिरे से विचार करने को कहा, लेकिन उसके पास वही नाम फिर से भेज दिए गए। अब सरकार के पास इन नामों को मंजूर करने के अलावा और कोई उपाय नहीं। क्या यह विचित्र नहीं कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकार के पास अधिकार के नाम पर मात्र यह करने को है कि वह कोलेजियम की ओर से भेजे गए नामों को हरी झंडी दे दे? यह तो मुहर भर लगाने वाला काम हुआ। नि:संदेह यह कहना कठिन है कि कोलेजियम की ताजा सिफारिश पर सरकार की आपत्ति कितनी उचित थी, लेकिन यह ठीक नहीं कि न्यायाधीश ही न्यायाधीश की नियुक्ति करें और इस क्रम में पारदर्शिता के लिए कहीं कोई स्थान भी नजर न आए। क्या कोई इसकी अनदेखी कर सकता है कि कुछ समय पहले खुद कोलेजियम ने उन न्यायाधीशों के नाम प्रोन्नति सूची से बाहर कर दिए थे जिन्हें खुद उसने ही तय किए थे? चूंकि इस मामले में न्यायाधीशों की वरिष्ठता की भी अनदेखी की गई थी इसलिए बार कौंसिल के साथ सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश ने भी सवाल खड़े किए, लेकिन कोई संतोषजनक जवाब सामने नहीं आया। क्या इससे न्यायपालिका की गरिमा और प्रतिष्ठा बढ़ी? निश्चित तौर पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनी रहनी चाहिए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की एक ऐसी प्रक्रिया जारी रहे जिसका संविधान में उल्लेख ही नहीं। यह उल्लेखनीय है कि दुनिया के किसी भी प्रतिष्ठित लोकतांत्रिक देश में न्यायाधीश ही न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं करते, लेकिन भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसा ही है। क्या अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि के बारे में यह कहा जा सकता है कि इन देशों की न्यायपालिका भारत से कम स्वतंत्र हैै? चिंताजनक केवल यह नहीं है कि वह कोलेजियम व्यवस्था बनी हुई है जिसे खुद सुप्रीम कोर्ट ने दोषपूर्ण माना था, बल्कि यह भी है कि इस व्यवस्था के दोष दूर करने का काम नहीं हुआ। कोलेजियम व्यवस्था के दोष दूर करने की बात न्यायिक नियुक्ति आयोग संबंधी कानून को निरस्त करते वक्त कही गई थी। इस कानून को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह गैर संवैधानिक है, लेकिन यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि आखिर कोलेजियम की व्यवस्था संविधान के अनुरूप कैसे है? यह कोलेजियम व्यवस्था का ही परिणाम है कि न्यायाधीशों की नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद के आरोप उछलते रहते हैैं। एक ऐसे समय जब समूची न्यायपालिका में सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट को बहुत कुछ करना है तब यह देखना दयनीय है कि वह जजों की नियुक्ति के मसले को ही सुलझा पाने में नाकाम है।