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ब्लैक होल

सामान्य सापेक्षता (जॅनॅरल रॅलॅटिविटि) में, कृष्ण विवर (Black Hole) या कालाछिद्र इतने शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र वाली कोई ऐसी खगोलीय वस्तु है, जिसके खिंचाव से प्रकाश-सहित कुछ भी न बच सके। कालेछिद्र के चारों ओर घटना क्षितिज नामक एक सीमा होती है जिसमें वस्तुएँ गिर तो सकती हैं परन्तु बाहर कुछ नहीं आ सकता।इसे “काला” (कृष्ण) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अपने ऊपर पड़ने वाले सारे प्रकाश को अवशोषित कर लेता है और कुछ भी परावर्तित नहीं करता। यह ऊष्मागतिकी में ठीक एक आदर्श कृष्णिका की तरह है। कालेछिद्र का क्वांटम विश्लेषण यह दर्शाता है कि उनमें तापमान और हॉकिंग विकिरण होता है। अपने अदृश्य भीतरी भाग के बावजूद, एक कालाछिद्र अन्य पदार्थों के साथ अन्तः-क्रिया के माध्यम से अपनी उपस्थिति प्रकट कर सकता है। मसलन कालेछिद्र का पता तारों के किसी समूह की गति से लगाया जा सकता है जो अन्तरिक्ष के खाली दिखाई देने वाले एक हिस्से की परिक्रमा कर रहे हों। वैकल्पिक रूप से, एक साथी तारे द्वारा आप अपेक्षाकृत छोटे कालेछिद्र में गैस गिराते हुए देख सकते हैं। यह गैस सर्पिल आकार में अन्दर की तरफ आती है, बहुत उच्च तापमान तक गर्म हो कर बड़ी मात्रा में विकिरण छोड़ती है जिसका पता पृथ्वी पर स्थित या पृथ्वी की कक्षा में घूमती दूरबीनों से लगाया जा सकता है। इस तरह के अवलोकनों के परिणाम स्वरूप यह वैज्ञानिक सर्व-सम्मति उभर कर सामने आई है कि, उनके स्वयं न दिखने के बावजूद, हमारे ब्रह्मांड में कालेछिद्र अस्तित्व रखते है। इन्हीं विधियों से वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि हमारी गैलेक्सी, क्षीरमार्ग, के केन्द्र में स्थित धनु ए* नामक रेडियो स्रोत में एक विशालकाय कालाछिद्र स्थित है जिसका द्रव्यमान हमारे सूरज के द्रव्यमान से 43 लाख गुना है।एक ऐसे भारी शरीर की अवधारणा जिससे कि प्रकाश भी बचने से असमर्थ हो को, भूविज्ञानी जॉन मिचेल द्वारा 1783 में हेनरी कावेंदिश को लिखे गये एक पत्र में प्रकट किया गया था और रॉयल सोसाइटी द्वारा प्रकाशित किया गया था |1796 में, गणितज्ञ पिएर्रे-साइमन लाप्लास ने अपनी किताब एक्स्पोसिशन डू सिस्टेम डू मोंडे के पहले और दूसरे संस्करण में इसी विचार को बढ़ावा दिया था |1915 में, अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत को विकसित किया, वे पहले ही यह सिद्ध कर चुके थे कि गुरुत्वाकर्षण प्रकाश की गति पर वास्तव में प्रभाव डालता है। कुछ महीने बाद, कार्ल स्च्वार्जस्चिल्ड ने एक बिंदु द्रब्यमान और एक गोलाकार द्रव्यमान के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र का समाधान दिया|1930 में, खगोलविद सुब्रमन्यन चंद्रशेखर नें सामान्य सापेक्षता का उपयोग करते हुए यह गणना की कि इलेक्ट्रॉन-डिजनरेट पदार्थ वाले एक गैर-चक्रित शरीर का सौर द्रव्यमान यदि 1.44 (चंद्रशेखर सीमा) से अधिक हुआ तो उसका पतन हो जायेगा।चंद्रशेखर सीमा से थोडा अधिक द्रब्यमान वाला सफेद बौनासितारा पतन के बाद न्यूट्रॉन तारे में परिवर्तित हो जायेगा|जब किसी बड़े तारे का पूरा का पूरा ईंधन जल जाता है तो उसमें एक ज़बरदस्त विस्फोट होता है जिसे सुपरनोवा कहते हैं। विस्फोट के बाद जो पदार्थ बचता है वह धीरे धीरे सिमटना शुरू होता है और बहुत ही घने पिंड का रूप ले लेता है जिसे न्यूट्रॉन स्टार कहते हैं। अगर न्यूट्रॉन स्टार बहुत विशाल है तो गुरुत्वाकर्षण का दबाव इतना होगा कि वह अपने ही बोझ से सिमटता चला जाएगा और इतना घना हो जाएगा कि ब्लैक होल बन जाएगा और श्याम विवर, कृष्ण गर्त या ब्लैक होल के रूप में दिखाई देगा।स्टीफेन हॉकिंग ने यह दर्शाया कि बिग बैंग के कई ब्रह्मांडीय समाधानों में सिन्ग्युलेरिटी का अस्तित्व है, स्केलर क्षेत्रों और अन्य विदेशी पदार्थों की अनुपस्थिति में (देखें: पेनरोज़-हॉकिंग सिन्ग्युलेरिटी प्रमेय)। केर्र समाधान, नो-हेयर प्रमेय और ब्लैक होल ऊष्मप्रवैगिकी के नियमों ने दर्शाया कि ब्लैक होल के भौतिक लक्षण सरल हैं और आसानी से समझे जा सकते हैं, इन्हें शोध के सम्मानित विषयों का दर्जा मिल गयाऐसा माना जाता है कि ब्लैक होलों के निर्माण की प्राथमिक प्रक्रिया तारों जैसी भारी वस्तुओं का गुरुत्त्वीय पतन रही होगी, लेकिन कई अन्य प्रक्रियाएं भी हैं जो ब्लैक होल के निर्माण की तरफ ले जा सकती हैं।गुरुत्वीय पतन के लिए बहुत अधिक घनत्व की आवश्यकता होती है। ब्रह्मांड के वर्तमान युग में यह उच्च घनत्व केवल तारों में ही मिलती है, लेकिन प्रारंभिक ब्रह्मांड में बिग बैंग के शीघ्र बाद घनत्व काफी अधिक हुआ करते थे, हो सकता है इसी ने ब्लैक होल के निर्माण को संभव बनाया हो। उच्च घनत्व अकेले एक ब्लैक होल के निर्माण के लिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि द्रब्यमान का समान वितरण, द्रब्यमान को इकट्ठा होने की अनुमति नहीं देगा। इस घने माध्यम में प्राचीन ब्लैक होलों के गठन हेतु, प्रारंभिक घनत्वीय गड़बड़ियों का होना आवश्यक है जो बाद में स्वयं के गुरुत्त्व के प्रभाव में बढ़ सकें। प्रारंभिक ब्रह्मांड के विभिन्न मॉडलों में इन गड़बडियों के आकार के बारे में व्यापक मतभेद है। विभिन्न मॉडलों ने ब्लैक होल के निर्माण का पूर्वानुमान लगाया था, प्लैंक द्रव्यमान से लेकर सैकड़ों हजारों सौर द्रब्यामानों तक के।अतः आदिम ब्लैक होल किसी भी प्रकार के ब्लैक होल के निर्माण का कारण हो सकते हैं।सामान्य सापेक्षता में ऐसे विन्यास की संभावना का वर्णन किया गया है जिसमें दो ब्लैक होल एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।1971 में, स्टीफन हॉकिंग ने दिखाया कि पारंपरिक ब्लैक होल के किसी भी संग्रह के घटना क्षितिज के कुल क्षेत्र को कम नहीं किया जा सकता है, भले ही वे आपस में टकरा कर एक दूसरे को निगल लें, अर्थात विलय हो जाए।लेओनार्ड सस्किंड और नोबेल पुरस्कार विजेता जेरार्ड टी हूफ्ट ने यह सुझाव दिया है कि ब्लैक होल के चारों और के त्रिआयामी अन्तरिक्ष को घटना क्षितिज के एक द्विआयामी व्यवहार द्वारा पूर्ण रूप से वर्णित किया जा सकता है।

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