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मरने का अधिकार

मरने का अधिकार

9 मार्च, 2018 का दिन भारतीय इतिहास में सुर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया।सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों वाली संवैधानिक पीठ ने अपने पूर्व के फैसलों को पलटते हुए निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को कानूनी अधिकार प्रदान कर दिया।सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने अपने निर्णय में ‘मरने के अधिकार’ को जीने के अधिकार के साथ जोड़ते हुए कहा कि जिस प्रकार सम्मान के साथ जीना व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार है ठीक उसी तरह गरिमा के साथ मरना भी हरएक नागरिक का हक होना चाहिए।संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए माननीय न्यायालय ने उक्त बात कही।

इच्छामृत्यु’ का मामला कई दशकों से चला आ रहा बहुत संवेदनशील मुददा है जिसपर समग्रता से विचार करने की जरूरत थी।शायद यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को आने में इतना वक्त लग गया। पहली बार इच्छामृत्यु का मामला क्रांतिकारी माकपा नेता ‘बी टी रणदिवे’ की दया मृत्यु याचिका पर आया। चूँकि वे रक्त केंसर जैसी लाइलाज बीमारी से ग्रसित थे। उसके बाद कई लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रपति को दया मृत्यु के लिए याचिकाएं भेजी किन्तु सर्वोच्च न्यायालय अपने पूर्व के फैसलों पर अटल रहा।2015 को अरुणा शोनवाग के मामले में जोकि एक बलात्कार की  पीड़िता थी को राहत देते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु का ऐतिहासिक आदेश दिया। 2015 के बाद इच्छामृत्यु के संदर्भ में देश में एक बड़ी बहस ने जन्म लिया,जिसका असर 9मार्च 2018 के फैसले में दिखा।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के प्रावधान

न्यायलय ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को क़ानूनी अधिकार देते हुई कहा कि यद्यपि इच्छा मृत्यु का मामला व्यक्ति का निजी मामला है किंतु इसे लागू करवाना किसी तीसरे पक्षकार जी जद में है जिससे कानून के दुरुपयोग की संभावनाएं बढ़ जाती है। अमेरिका,स्विट्जरलैंड,बेल्जियम,लंदन आदि देशों में इच्छा मृत्यु के सभी आयामों पर गौर करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने भारत में इच्छा मृत्यु के उपयोग हेतु निम्न प्रावधान किए है-

  • इच्छा मृत्यु के निष्क्रिय रूप का कानूनी अधिकार ही भारत में दिया गया है यानि कोई नागरिक किसी गंभीर और असाध्य बीमारी से ग्रसित है,जिसका इलाज आने वाले समय में भी संभव न हो, रोगी को असहनीय पीड़ा सहन करनी पड़ रही हो, रोगी को मेडिकल उपकरणों के माध्यम से जिन्दा रखा गया हो तो ऐसी स्तिथि में उसे निष्क्रिय इच्छा मृत्यु दी जा सकती है।
  • निष्क्रिय इच्छा मृत्यु के लिए सर्वप्रथम उच्च न्यायालय में आवेदन करना पड़ेगा उसके बाद डॉक्टरों की एक टीम सभी पक्षों की गहराई से जाँच कर अपनी रिपोर्ट सम्बंधित मजिस्ट्रेट को सौपेगी।
  • डॉक्टरों की सलाह और मजिस्ट्रेट की जाँच के आधार पर रोगी के परिजनों की उपस्तिथि में रोगी के मेडिकल उपकरणों को हटा कर उसे प्राकृतिक मृत्यु के लिए छोड़ दिया जायेगा।

चुनोतिया

  • भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में जहाँ अभी भी आधी से ज्यादा आबादी अशिक्षित है,इच्छा मृत्यु जैसा आधुनिक कानून देना अपने आप को तमाम सभ्य समाजों के बराबर लेकर आने वाला साहसी कदम है।अतः यह स्वाभाविक है कि इसके दुरुपयोग की संभावनाएं उतनी ही प्रवल हैं।
  • आज भारत में मानसिक रोगियों की संख्या विश्व में सबसे ज्यादा है। लोग अनेकों समस्याओं से ग्रसित होने के कारण जिंदगी से हार मान लेते है और अपने लिए मौत की मांग करने लगते हैं।
  • महंगी चिकित्सा सुविधाओं के चलते कई लोग अपने परिजनों के इलाज का खर्च बहन नहीं कर पाते और रोगी के साथ वे भी दिन रात पीड़ा सहन करते हैं। किन्तु जब देश में इस तरह का कानून होगा तो वे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़कर इसका दुरुपयोग करने का प्रयास करेंगे।
  • आधुनिक बाजारवादी युग में बुजुर्ग माँ बाप की देखभाल करना संतानों के लिए एक अभिशाप से कम नहीं लगता जिसके चलते वे अपने परिजनों को वृद्धाश्रम जैसी जगह छोड़ आते हैं किंतु जब देश में इच्छा मृत्यु का कानून होगा तो अधिकांश पीड़ित माँ बाप अपने लिए मौत की मांग करेंगे और उनकी संतानें भी अपना आर्थिक बोझ कम करने के लिए कानून का गलत प्रयोग कर सकती हैं।
  • कई नैतिक,कानूनी,सामाजिक,चिकित्साशास्त्रीय,जीवविज्ञानी और मानवाधिकार संबंधी मुद्दे इच्छा मृत्यु के अधिकार को लेकर उलझे हुए हैं जिनपर सार्थक चर्चा होना बाकी है।

निष्कर्

सर्वोच्च न्यायालय का इच्छा मृत्यु के संदर्भ निर्णय उन सभी पीड़ितों के लिए जो अपनी बीमारी के कारण तिल तिल मरने को मजबूर है,एक राहत भरा और सराहनीय कदम है।

जागरूक जानता को हर संभव न्यायलय के दिशानिर्देशों के अनुसार ही इस अधिकार का प्रयोग करना चाहिए।

विधायिका और कार्यपालिका से आशा की जाती है कि वह इच्छा मृत्यु के न केवल दुरूपयोग को रोके बल्कि इसके संबंध में एक मजबूत विधि का निर्माण करे।